फातेह आलम तालझारी
राजमहल : एक तरफ झारखंड सरकार और साहिबगंज जिले के सिविल सर्जन डॉ. रामदेव पासवान टीबी (क्षय रोग) को जड़ से खत्म करने के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे हैं, वहीं राजमहल अनुमंडलीय अस्पताल में भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं। ताजा मामला अस्पताल में कार्यरत टीबीएचबी (TVHB) अमित कुमार से जुड़ा है, जिन पर अपने मूल कार्यों को छोड़कर बीपीएम और बीएएम के प्रभार में रहकर अवैध वसूली और ‘लूटतंत्र’ चलाने के गंभीर आरोप लगे हैं।
मूल काम छोड़ ‘कमीशनखोरी’ में लिप्त होने का आरोप
सूत्रों और अस्पताल कर्मियों के अनुसार, अमित कुमार का मूल कार्य टीबी के मरीजों की सेवा करना और इस बीमारी को खत्म करने में योगदान देना है। लेकिन, पिछले 8-10 वर्षों से वे बीपीएम और बीएएम का प्रभार संभाल रहे हैं। आरोप है कि इस पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने अस्पताल के भीतर एक ऐसा तंत्र खड़ा कर लिया है, जहां बिना ‘कमीशन’ के एक पत्ता भी नहीं हिलता। रेट कार्ड ममता वाहन से लेकर सहिया तक सब परेशान अस्पताल के भीतर चल रहे इस कथित भ्रष्टाचार का जाल काफी व्यापक बताया जा रहा है ममता वाहन सूत्रों का दावा है कि ममता वाहन के भुगतान में 20% अग्रिम कमीशन वसूला जाता है।
सीएचओ (CHO): किसी सीएचओ को छुट्टी चाहिए या वेतन रोकना टलवाना हो, तो ₹5000 तक का ‘नजराना’ पेश करना पड़ता है।
सहिया और एएनएम: सहियाओं के भुगतान पर 10 से 15% की कटौती की जाती है। एएनएम और एमपीडब्ल्यू भी इस सेटिंग और सेवा शुल्क के खेल से त्रस्त हैं।
अवैध क्लीनिक: क्षेत्र में चल रहे झोलाछाप डॉक्टरों और अनाधिकृत क्लीनिकों से भी कथित तौर पर मासिक उगाही का फिक्स नेटवर्क बना हुआ है। नेताजी और मामू” का रसूख: ट्रांसफर का कोई डर नहीं हैरानी की बात यह है कि इस संबंध में पहले भी कई खबरें प्रकाशित हुई हैं, लेकिन कार्रवाई सिफर रही। सूत्रों के मुताबिक, अमित कुमार खुलेआम धौंस जमाते हैं कि “जब तक नेताजी का हाथ है, तब तक कोई मेरा ट्रांसफर नहीं कर सकता।” इतना ही नहीं, जिले के वरीय अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल कर वे कर्मियों को डराते-धमकाते हैं ताकि कोई उनके खिलाफ आवाज न उठा सके। साहब इतने शातिर हैं कि किसी को भी अपनी बातों में फंसा लेते हैं। वे अक्सर सिविल सर्जन को अपना रिश्तेदार बताकर रसूख झाड़ते हैं, ताकि उनका लूटतंत्र बेरोकटोक चलता रहे। अस्पताल के एक पीड़ित कर्मी (नाम गोपनीय) उपायुक्त से जांच की गुहार राजमहल अनुमंडलीय अस्पताल के त्रस्त कर्मियों और स्थानीय लोगों ने जिले के उपायुक्त (DC) से इस मामले में तत्काल संज्ञान लेने की अपील की है। मांग की जा रही है कि:
अमित कुमार की पिछले 10 वर्षों की कुल संपत्ति की उच्चस्तरीय जांच हो। उन्हें बीपीएम/बीएएम के प्रभार से हटाकर उनके मूल पद (टीबीएचबी) पर वापस भेजा जाए या अन्यत्र स्थानांतरित किया जाए। अस्पताल के भुगतान रजिस्टरों की बारीकी से ऑडिट कराई जाए। यदि स्वास्थ्य विभाग के भीतर ही ऐसे ‘दीमक’ मौजूद रहेंगे, तो सरकार का टीबी मुक्त झारखंड का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘सिंडिकेट’ को तोड़ने के लिए क्या कदम उठाता है।


