सोनू कुमार सिंह
रामगढ़ : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पैतृक गांव नेमरा में गुरुवार का दिन बेहद गमगीन रहा। गांव की हवा में एक अजीब सी खामोशी पसरी थी, जहां सियासत का शोर थम गया था और सिर्फ एक बेटे के अपनी मां को खोने का दर्द गूंज रहा था। हेमंत सोरेन किसी राज्य के मुखिया के तौर पर नहीं, बल्कि रूपी सोरेन के बेटे के रूप में अपनी मां को अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। जैसे ही अंतिम यात्रा गांव की पगडंडियों से होते हुए श्मशान की ओर बढ़ी, पूरा माहौल भावुक हो गया।
इस दुख की घड़ी में कोई सत्ता पक्ष या विपक्ष नहीं था। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर दूसरे दलों के नेताओं और जिले के बड़े प्रशासनिक अधिकारियों तक, सभी सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर केवल इस परिवार के दुख में शामिल होने आए थे। राजनीतिक मतभेद भूलकर हर कोई इस निजी क्षति पर परिवार को सांत्वना देता नजर आया।
सबसे मार्मिक पल वह रहा जब श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई। पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच जब हेमंत सोरेन ने कांपते हाथों से अपनी मां की चिता को मुखाग्नि दी, तो वे खुद को संभाल नहीं पाए। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। चिता से उठती लपटों के साथ ही वहां खड़े हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं और पूरा गांव एक साथ रो पड़ा।
नेमरा में आज का यह दृश्य इस बात की गवाही दे गया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, मां के आंचल की छाया उठ जाने का गम सबसे बड़ा होता है। पद, प्रतिष्ठा और प्रोटोकॉल सब एक तरफ रह जाते हैं और रह जाता है तो बस एक बेटा और उसकी मां से जुड़ी अधूरी यादें।


