गोपाल विद्यार्थी
पटना : आज के किशोरों पर पढ़ाई, परीक्षा, प्रतियोगिता, रोजगार की चिंता, बुलिंग और निजी संबंधों से जुड़ा काफी दबाव है। इसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। इसलिए बच्चों के व्यवहार और भावनाओं में होने वाले बदलावों को समय रहते समझना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की मदद लेना जरूरी है। उक्त बातें बिहार लोक भवन में बुधवार को महिला इमदाद कमिटी द्वारा ‘मानसिक स्वास्थ्य का महत्व, किशोरों का संज्ञानात्मक एवं भावनत्मक स्वास्थ्य’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए बिहार के राज्यपाल सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल सय्यद अता हसनैन ने कही | उन्होंने कहा कि असफलता जीवन का अंत नहीं है, बल्कि इससे सीखकर आगे बढ़ने का मौका मिलता है। परीक्षा में कम अंक आना या किसी काम में असफल होना किसी बच्चे के भविष्य को तय नहीं करता। अभिभावकों और शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों की बात ध्यान से सुनें और उन्हें ऐसा माहौल दें, जहाँ वे बिना डर के अपनी परेशानियाँ बता सकें।
राज्यपाल ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को छिपाना या उन्हें नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। ऐसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के प्रति संवेदनशीलता और सहयोग का भाव रखना चाहिए | राज्यपाल ने कहा कि एक मजबूत समाज वह नहीं है, जहाँ किसी को कोई परेशानी न हो, बल्कि वह है जहाँ किसी को भी अपनी परेशानी अकेले न झेलनी पड़े। उन्होंने सभी से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों का साथ देने और उन्हें सहयोग प्रदान करने का आह्वान किया। लेडी गवर्नर और महिला इमदाद कमिटी की अध्यक्ष श्रीमती सबीहा हसनैन ने कहा कि सोशल मीडिया पर किशोरों की बातें और युवाओं से बातचीत के दौरान उन्होंने महसूस किया कि बच्चे पढ़ाई के दबाव, अभिभावकों की अपेक्षाओं और समाज के डर से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों पर अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाएँ थोपने और ‘लोग क्या कहेंगे’ की सोच से बचना चाहिए। ऑटिज्म जैसी स्थितियों में शुरुआती पहचान और समय पर उचित मदद बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना इस वर्ष महिला इमदाद कमिटी के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
स्वास्थ्य विभाग के सचिव कुमार रवि ने कहा कि राज्य में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम और टेली-मानस के माध्यम से सेवाएँ उपलब्ध करायी जा रही हैं। उन्होंने स्कूलों में योग और ध्यान को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के सहयोग से किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य, सीखने की क्षमता और भावनात्मक विकास को बेहतर बनाया जा सकता है। काउंसलर एवं संगठनात्मक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ॰ दीप्ति कठपालिया ने कहा कि बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए उन्हें सुरक्षित माहौल देना जरूरी है, जहाँ वे बिना डर और झिझक के अपनी बात कह सकें।अभिभावकों, शिक्षकों और संस्थानों के प्रमुखों को बच्चों की बात बिना किसी पूर्वाग्रह के सुननी चाहिए, उनका भरोसा जीतना चाहिए और उनके लिए सहयोगी बनना चाहिए। बिहार राज्य मानसिक स्वास्थ्य संस्थान कोईलवर के डॉ जयेश रंजन व डॉ॰ विनय कुमार, समत्व एडवांस्ड न्यूरोसाइकियाट्रिक एंड डी-एडिक्शन सेंटर के निदेशक डॉ शुभांगी सिंह, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के राज्य परामार्शदाता प्रीति वाजपेयी व राज्य मानसिक स्वास्थ्य केंद्र कोईलवर के डॉ पुजेइगोबा ने भी अपने विचार साझा किए। इस दौरान पैनल चर्चा एवं प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें किशोरों के मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।
मौके पर राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह, बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक डॉ नवल किशोर चौधरी, महिला इमदाद कमिटी के सदस्यगण, चिकित्सकगण, विभिन्न विद्यालयों के शिक्षक-शिक्षिकाएँ, अभिभावकगण एवं अन्य लोग उपस्थित थे।


