ईचागढ़ : सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ और कुकड़ू प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न गांवों में प्रकृति और अटूट भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक महापर्व ‘करम पूजा’ अत्यंत धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर पूरे ग्रामीण इलाकों का माहौल पूरी तरह से भक्तिमय और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर नजर आया।
अनूठी परंपरा और अनुष्ठान
इस पर्व की शुरुआत व्रती महिलाओं द्वारा पर्व से तीन दिन पूर्व नदी, सतिया और नालों से पारंपरिक तरीके से बालू उठाकर अपने घरों तक लाने से होती है। इसके पश्चात, मंगलवार को पूरे विधि-विधान के साथ आंगन में करम डाली स्थापित कर निष्ठापूर्वक पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान महिलाओं और युवतियों ने पारंपरिक गीत गाए और मनमोहक करम नृत्य के जरिए करम राजा से सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगा।
सालों से जीवंत है आस्था की परंपरा
ग्रामीण निमाई चंद्र महतो ने बताया कि बिस्टाटांड गांव में पिछले 48 वर्षों से लगातार एक ही अखाड़े में भव्य रूप से करम पूजा का आयोजन किया जाता है। वहीं, बड़ा चुंनचूड़िया गांव निवासी करम गोप भी पिछले 39 वर्षों से अपने आंगन में पूरी निष्ठा के साथ इस पर्व का आयोजन करते आ रहे हैं, जो हमारी समृद्ध संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहा है।
प्रकृति संरक्षण और भाई-बहन के पवित्र प्रेम का संदेश
बुजुर्गों और ग्रामीणों के अनुसार, करम पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति संरक्षण, पर्यावरण के संवर्धन और जीवन को गति देने वाला महान पर्व है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए करम एकादशी का व्रत रखती हैं, जो भाई-बहन के रिश्ते को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है।
भादो माह से शुरू हो जाती है तैयारियां
भादो का महीना शुरू होते ही इस महापर्व की तैयारियां जोर-शोर से आरंभ हो जाती हैं। खेतों में धान की रोपाई और कृषि कार्य संपन्न होने के बाद ग्रामीणों में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि करम राजा की असीम कृपा से उनके घरों में अन्न-धन और समृद्धि की कभी कोई कमी नहीं होगी।
चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में प्रकृति का महापर्व ‘करम’ हर्षोल्लास के साथ संपन्न, बिस्टाटांड में 48 वर्षों से निरंतर जारी है परंपरा

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