झारखंड डीजीपी नियुक्ति नियम पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति, तदाशा मिश्रा से मांगा जवाब

Lok Bimb
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नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति से जुड़े राज्य सरकार के नियमों पर प्रथम दृष्टया सवाल उठाते हुए कहा कि ये नियम उसके पुराने आदेशों और प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों के विपरीत प्रतीत होते हैं। अदालत ने राज्य की वर्तमान डीजीपी तदाशा मिश्रा को अपना पक्ष रखने का अवसर देते हुए उनसे जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि यदि विवादित नियम को रद्द किया जाता है तो इसका सीधा असर उनकी नियुक्ति पर पड़ सकता है।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहाना की पीठ ने की। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन अदालत के सहयोगी (एमिकस क्यूरी) के रूप में पीठ की सहायता कर रहे हैं।
1994 बैच की भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी तदाशा मिश्रा को झारखंड सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को राज्य का डीजीपी नियुक्त किया था। उनकी नियुक्ति उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले की गई थी। विवाद का प्रमुख बिंदु यह है कि राज्य सरकार के संशोधित नियमों के तहत ऐसे अधिकारी को भी डीजीपी पद के लिए पात्र माना गया, जिसकी सेवानिवृत्ति में छह महीने से कम समय बचा हो।
पीठ ने कहा कि इस व्यवस्था के तहत अधिकारी को पिछली तारीख से सेवा का लाभ देकर नियुक्ति के योग्य बनाया गया। अदालत ने प्रथम दृष्टया इसे प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों के विपरीत बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विवादित प्रावधान पहली नजर में प्रकाश सिंह मामले में तय कानून के बिल्कुल विपरीत दिखाई देता है। यदि नियम को रद्द किया जाता है तो इसके परिणामस्वरूप तदाशा मिश्रा की झारखंड डीजीपी के पद पर नियुक्ति भी रद्द हो सकती है। इसी कारण अदालत ने उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर देना उचित समझा।
पीठ ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया कि वह तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी करे, ताकि वह अदालत के समक्ष उपस्थित होकर मामले में अपना पक्ष रख सकें और पीठ की सहायता कर सकें।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यदि झारखंड सरकार विवादित नियमों का बचाव करना चाहती है तो वह अपना जवाब दाखिल कर सकती है। इस पर पीठ ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति देने की बात कही।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस दौरान केंद्र सरकार की ओर से मामले का विरोध कर रहे तुषार मेहता पर तंज भी कसा। उन्होंने पश्चिम बंगाल में डीजीपी की नियुक्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक अधिकारी अप्रैल में सेवानिवृत्त होने वाले थे, लेकिन उन्हें मार्च में ही डीजीपी नियुक्त कर दिया गया था और केंद्र सरकार ने स्वयं उनके कार्यकाल को छह महीने बढ़ाया था। सिब्बल ने कहा कि उनके विद्वान मित्र को उस नियुक्ति के खिलाफ भी याचिका दायर करनी चाहिए।
अदालत के सहयोगी राजू रामचंद्रन ने कहा कि उनके अनुसार यह केवल झारखंड का मामला नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति कई राज्यों में देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा, जहां तक मेरा सवाल है, यह हर राज्य की बात है… यह हर जगह हो रहा है।
पीठ केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें झारखंड सरकार की ओर से 8 जनवरी 2025 को जारी ‘झारखंड पुलिस महानिदेशक और महानिरीक्षक (पुलिस बल के प्रमुख) चयन एवं नियुक्ति विनियम, 2025 की वैधता को चुनौती दी गई है।
राजू रामचंद्रन ने पहले ही झारखंड के डीजीपी चयन एवं नियुक्ति नियमों की विस्तृत समीक्षा की थी। वह मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ की सहायता कर रहे हैं। यह पीठ उन याचिकाओं की सुनवाई कर रही है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि कई राज्यों ने डीजीपी की नियुक्ति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों का पालन नहीं किया है।
रामचंद्रन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वर्तमान डीजीपी की उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले की गई नियुक्ति मामले में दिए गए फैसलों और आदेशों में निर्धारित सिद्धांतों का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े राज्य सरकार के संशोधित नियमों को शीर्ष अदालत के पूर्व फैसले के विपरीत घोषित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में अदालत के सहयोगी राजू रामचंद्रन को इस मामले में अपनी रिपोर्ट पेश करने को कहा था। मरांडी की ओर से अधिवक्ता अभिषेक राय और ज्ञानांत सिंह ने पक्ष रखा।
रामचंद्रन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि विवादित नियमों के कई प्रावधान प्रकाश सिंह मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों की भावना के अनुरूप हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि मनमाने फैसलों और राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना को रोकने के लिए कुछ प्रावधानों में स्पष्टता और अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।
इस महीने की शुरुआत में केंद्र सरकार ने तदाशा मिश्रा की डीजीपी के रूप में नियुक्ति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। केंद्र ने कहा कि पुलिस प्रमुख के चयन और नियुक्ति से संबंधित झारखंड सरकार के वर्ष 2025 के नियम सुप्रीम कोर्ट के पहले जारी किए गए बाध्यकारी निर्देशों के विपरीत हैं।
केंद्र ने विशेष रूप से उस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई, जिसके तहत झारखंड सरकार ने अपने नियमों में बदलाव कर तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का रास्ता साफ किया। केंद्र की याचिका में 2025 के नियमों के तहत की गई नियुक्तियों की कानूनी वैधता पर भी सवाल उठाया गया है।
केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि झारखंड सरकार ने 29 दिसंबर को एक प्रस्ताव के माध्यम से डीजीपी पद पर नियुक्ति के लिए अधिकारी की कम से कम छह महीने की शेष सेवा की अनिवार्यता को हटा दिया। केंद्र का आरोप है कि इस बदलाव से तदाशा मिश्रा की डीजीपी के रूप में नियुक्ति का रास्ता साफ हुआ।
याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य सरकार ने विवादित नियमों को अधिसूचित करने से पहले 3 जुलाई 2018 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुरूप अदालत से अनुमति या मंजूरी नहीं ली।
प्रकाश सिंह मामला देश में पुलिस सुधारों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट की निगरानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने वर्ष 2006 से इस मामले में कई निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य पुलिस व्यवस्था को अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति में पारदर्शिता और योग्यता सुनिश्चित करना तथा उन्हें निश्चित कार्यकाल प्रदान करना है।
केंद्र सरकार का कहना है कि झारखंड सरकार द्वारा बनाए गए नए नियम इन बाध्यकारी निर्देशों की अनदेखी करते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा तदाशा मिश्रा को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए जाने के बाद इस मामले में आगे की सुनवाई में डीजीपी नियुक्ति के नियमों की वैधता पर महत्वपूर्ण फैसला होने की संभावना है।

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