मालखान महतो
ईचागढ़। सरायकेला-खरसावां जिले का ईचागढ़ आंचल इन दिनों अपनी माटी की सोंधी महक और लोक संस्कृति की जीवंत बानगी से गुलजार है। यहाँ के मिलन चौक और प्रसिद्ध सितु बाजार में सजने वाले साप्ताहिक हाट अब केवल खरीद-फरोख्त का ठिकाना भर नहीं, बल्कि ग्रामीण जनजीवन, आपसी आत्मीयता और परंपराओं के एक ऐसे महाकुंभ बन चुके हैं, जहाँ हर हफ्ते संस्कृति और व्यापार का अनूठा संगम देखने को मिलता है। इन साप्ताहिक बाजारों की विशालता और यहाँ उमड़ने वाली भारी भीड़ ने पूरे इलाके में एक अलग ही प्राण-फूंक दी है, जहाँ आम जनजीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जरूरत का सामान एक ही छत के नीचे सुलभ है।
“जहाँ सजते हुनर और रिश्तों के मेले हैं,
मिलन चौक और सितु बाजार, संस्कृति के ठेले हैं।
हर चेहरे पर रौनक, हर दिल में उमंग है,
यही तो मेरे झारखंड की असली जीवन-संग है।।”
सुबह की पहली किरण के साथ ही मिलन चौक और सितु बाजार की गलियाँ दुकानदारों की सरगर्मी और ग्राहकों के हुजूम से आबाद हो उठती हैं। सुदूर ग्रामीण इलाकों से आने वाले अन्नदाता किसान अपने खेतों की ताजी फसलें और मेहनत का परिणाम लेकर इन बाजारों का रुख करते हैं। ये बाजार असल मायनों में मेहनतकश किसानों और ग्रामीण कारीगरों के हुनर को सीधा बाजार उपलब्ध कराते हैं, जिससे उनकी मेहनत को उचित सम्मान और आर्थिक संबल दोनों मिल रहा है।
बांस की कलात्मक सूप, टोकरियाँ और स्थानीय दस्तकारों द्वारा गढ़े गए पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पाद यहाँ की आबोहवा को पूरी तरह ग्रामीण रंग में रंग देते हैं। खेतों से सीधे लाई गई ताजी हरी सब्जियाँ, स्थानीय फल और जैविक उपज ग्राहकों को अपनी ओर खींचती हैं। वहीं दूसरी ओर, दैनिक उपयोग के किराना सामान, वस्त्र, धातु के बर्तन, श्रृंगार प्रसाधन और बच्चों के खिलौनों की दुकानों पर खरीदारों की भारी रौनक पूरे माहौल को ऊर्जावान बना देती है।
इन बाजारों की सबसे बड़ी खूबी यहाँ के किफायती दाम और पारंपरिक मोल-भाव की वह संस्कृति है, जो आधुनिक मॉल कल्चर में कहीं खो 시 (सी) गई है। किसानों के हाथ की उपज, लोहे व बांस के घरेलू उपकरण और चाक पर गढ़े मिट्टी के बर्तन इन हाटों की पहचान को और पुख्ता करते हैं। यहाँ गूंजती खरीद-फरोख्त की आवाजें और दुकानदारों की पुकार इस पूरे आंचल को किसी भव्य लोक उत्सव में तब्दील कर देती हैं।
मिलन चौक और सितु बाजार महज व्यापारिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि यह ईचागढ़ की सामाजिकता के मिलन-बिंदु हैं। मीलों दूर से आए लोग यहाँ खरीदारी के बहाने अपने चिर-परिचितों से मिलते हैं, सुख-दुःख साझा करते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे सामाजिक ताने-बाने को और मजबूत करते हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच यह साप्ताहिक बाजार आज भी अपनी सनातनी और लोक संस्कृति की तासीर के साथ ईचागढ़ की धड़कन बना हुआ है।


