हेमन्त अहीर
गिरिडीह : झारखंड की राजनीति ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसकी पहचान केवल मंत्री या विधायक के रूप में नहीं, बल्कि एक लंबे समय तक जमीन पर काम करने वाले संगठनकर्ता के रूप में बनी थी। झारखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री और गिरिडीह के विधायक सुदिव्य कुमार सोनू का 56 वर्ष की उम्र में अचानक निधन उनके परिवार के साथ-साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा और प्रदेश की राजनीति के लिए भी बड़ी क्षति है।
शनिवार की रात गिरिडीह स्थित अपने आवास पर अचानक हार्ट अटैक आने के बाद उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। निधन की खबर सामने आते ही गिरिडीह से लेकर रांची तक राजनीतिक और सामाजिक हलकों में शोक की लहर फैल गई।
सुदिव्य कुमार सोनू का जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने राजनीति में किसी बड़े पद से शुरुआत नहीं की थी। उनका सफर एक सामान्य कार्यकर्ता से शुरू हुआ था और करीब तीन दशक के संघर्ष के बाद वह राज्य सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने वाले कैबिनेट मंत्री बने।
राजनीति उनके लिए पद नहीं, संगठन था :
26 जुलाई 1970 को गिरिडीह के हरसिंह रायडीह में जन्मे सुदिव्य कुमार सोनू ने पूर्णिया से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की। बाद में इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं की और राजनीति को अपना रास्ता बनाया।
वर्ष 1989 में वह झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़े। उस समय न उनके पास कोई बड़ा पद था और न राजनीतिक पहचान। वह पार्टी के कार्यक्रमों में शामिल होते, आंदोलनों में हिस्सा लेते और गांव-गांव जाकर संगठन का संदेश पहुंचाते थे। कई बार पार्टी का झंडा उठाकर चलने वाला यही कार्यकर्ता आगे चलकर झामुमो की रणनीति बनाने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हुआ।
1992 में उन्हें गिरिडीह नगर अध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 2003 में वह जिला अध्यक्ष बने और 2010 तक संगठन की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान उन्होंने शहर के साथ गांवों में भी पार्टी का आधार मजबूत किया।
उनकी राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही थी कि वह संगठन को केवल चुनाव के समय याद करने वाले नेता नहीं थे। लंबे समय तक कार्यकर्ताओं के बीच रहना और संगठन को लगातार सक्रिय रखना उनकी राजनीतिक शैली का हिस्सा रहा।
हार ने रास्ता नहीं रोका :
2009 में झामुमो ने उन्हें पहली बार गिरिडीह विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा। वह चुनाव हार गए। 2014 में भी उन्होंने चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली।
राजनीति में लगातार दो चुनाव हारना किसी नेता के लिए बड़ा झटका हो सकता है। लेकिन सोनू ने इसे अपनी राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं बनने दिया। वह संगठन में सक्रिय रहे और क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करते रहे।
2019 में आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई। उन्होंने भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को हराकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया। इस चुनाव में सोनू को 80,871 वोट मिले, जबकि शाहाबादी को 64,987 वोट मिले।
इसके बाद उनकी राजनीतिक भूमिका तेजी से बढ़ी। 2024 में उन्होंने फिर गिरिडीह से जीत दर्ज की। इस बार उन्हें 94,042 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 90,204 वोट मिले। लगातार दूसरी जीत के बाद उन्हें हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
एक सामान्य कार्यकर्ता से शुरू हुई यात्रा अब राज्य सरकार के महत्वपूर्ण निर्णयों तक पहुंच चुकी थी।
हेमंत सोरेन के भरोसेमंद साथी :
सुदिव्य कुमार सोनू की अहमियत केवल उनके विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। झामुमो में उन्हें संगठन और चुनावी रणनीति समझने वाले नेताओं में गिना जाता था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भरोसेमंद साथियों में उनकी पहचान बनी।
2024 के विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी की रणनीति और सोशल मीडिया संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका की चर्चा रही। झामुमो और सहयोगी दलों के बीच राजनीतिक तालमेल तथा दूसरे दलों के नेताओं को पार्टी से जोड़ने के प्रयासों में भी उनकी सक्रियता दिखाई दी।
हेमंत सोरेन के राजनीतिक संकट के समय कल्पना सोरेन के सक्रिय राजनीति में आने की रणनीति में भी सोनू की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई। गांडेय से कल्पना सोरेन को चुनाव लड़ाने के फैसले के पीछे उनकी रणनीतिक सोच की चर्चा हुई। बाद में कल्पना सोरेन ने उपचुनाव जीता और 2024 के विधानसभा चुनाव में भी अपनी सीट बरकरार रखी।
इससे यह समझा जा सकता है कि सोनू की भूमिका केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं थी। वह पर्दे के पीछे राजनीतिक समीकरण बनाने और संगठन को दिशा देने वाले नेताओं में शामिल थे।
मंत्री बने तो विभागों को भी सक्रिय करने की कोशिश की :
2024 में मंत्री बनने के बाद उन्हें उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति, खेल एवं युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग मिले।
उच्च शिक्षा मंत्री के रूप में छात्रों से जुड़े मुद्दों पर उनकी सक्रियता दिखाई दी। जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं को लेकर छात्रों के बीच पैदा हुए असंतोष के दौर में उन्होंने सरकार और छात्रों के बीच संवाद कायम करने की कोशिश की। परीक्षा से जुड़े विवादों, जांच और सुधार के मामलों में भी उनकी भूमिका रही।
नगर विकास और आवास विभाग में रहते हुए शहरों के विकास और आधारभूत ढांचे से जुड़े विषय उनकी प्राथमिकताओं में रहे। वहीं गिरिडीह के विकास के लिए विश्वविद्यालय, मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, विद्यालय, लाइब्रेरी, सिंचाई परियोजना, सड़क और बायपास जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई।
पर्यटन में झारखंड की अलग पहचान बनाने का सपना :
पर्यटन विभाग उनके काम का एक ऐसा क्षेत्र था, जहां उनकी सोच केवल पर्यटन स्थलों के सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं थी। वह झारखंड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक ताकत को रोजगार और अर्थव्यवस्था से जोड़ना चाहते थे।
इको-टूरिज्म के लिए जेईटीए समिति को सक्रिय करने, ट्राइबल टूरिज्म और माइंस टूरिज्म सर्किट विकसित करने तथा स्थानीय लोगों को पर्यटन से जोड़ने की दिशा में पहल की गई।
रजरप्पा, पंचघाघ और नेतरहाट में स्काई वॉक यानी ग्लास ब्रिज की योजनाओं को आगे बढ़ाया गया। नेतरहाट उत्सव की तैयारी की गई। पश्चिम बंगाल के पर्यटकों को झारखंड की ओर आकर्षित करने के लिए कोलकाता में टूरिज्म रोड शो किया गया।
उन्होंने कर्नाटक के पर्यटन मॉडल का अध्ययन भी किया। होमस्टे पॉलिसी और नई पर्यटन नीति पर काम आगे बढ़ाया गया। खेल और पर्यटन को एक साथ बढ़ावा देने के उद्देश्य से महेंद्र सिंह धोनी से मुलाकात भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा थी।
उनका सपना था कि झारखंड की पहचान केवल खनिज संपदा वाले राज्य के रूप में न हो, बल्कि यहां की प्रकृति, संस्कृति, जनजातीय जीवन और पर्यटन भी देश-दुनिया में पहचान बनाए।
गिरिडीह को लेकर था अपना विजन :
सुदिव्य सोनू के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा आधार गिरिडीह रहा। विधायक बनने के बाद उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए कई योजनाओं को आगे बढ़ाया।
विश्वविद्यालय से लेकर मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, महिला महाविद्यालय, मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय, लाइब्रेरी, बायोडायवर्सिटी पार्क और अन्य शैक्षणिक योजनाओं पर जोर दिया गया।
पीरटांड़ की मेगा लिफ्ट सिंचाई परियोजना, फोरलेन और बायपास सड़क, मेधा डेयरी परियोजना तथा गिरिडीह को सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की योजनाएं भी उनकी प्राथमिकताओं में रहीं।
उसरी नदी के किनारे मरीन ड्राइव और खंडोली-वाटरफॉल के सौंदर्यीकरण जैसी योजनाओं के जरिए पर्यटन और शहरी विकास को जोड़ने की कोशिश की गई।
निजी जिंदगी में सादगी और अलग रुचियां :
राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच सुदिव्य कुमार सोनू को फोटोग्राफी और घूमने का शौक था। वह समय मिलने पर यात्राएं करते थे। रणथंभौर और बेंगलुरु की उनकी यात्राएं भी चर्चा में रही थीं।
परिवार की बात करें तो वह अपने पीछे पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे को छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी गृहिणी हैं। बड़ी बेटी एमबीए की पढ़ाई कर रही हैं, दूसरी बेटी इंटरमीडिएट में है और बेटा पांचवीं कक्षा में पढ़ता है।
एक अधूरा रह गया सफर :
सुदिव्य कुमार सोनू की कहानी झारखंड की उस राजनीति की कहानी है, जहां एक सामान्य कार्यकर्ता वर्षों तक संगठन के लिए काम करते हुए धीरे-धीरे नेतृत्व की पहली पंक्ति तक पहुंचता है।
उन्होंने दो चुनाव हारे, लेकिन राजनीति नहीं छोड़ी। संगठन में काम करते रहे, तीसरे प्रयास में विधायक बने और फिर लगातार दूसरी जीत के बाद मंत्री बने। सत्ता में पहुंचने के बाद उनके सामने कई बड़े विभाग और कई बड़े सपने थे।
झारखंड के पर्यटन को नई पहचान देना हो, गिरिडीह को शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र में आगे ले जाना हो या छात्रों के सवालों पर सरकार और युवाओं के बीच संवाद बनाना—उनकी राजनीतिक यात्रा अभी आगे बढ़ने की स्थिति में थी, लेकिन जिंदगी ने उन्हें इसके लिए ज्यादा समय नहीं दिया।
56 वर्ष की उम्र में उनका अचानक जाना सिर्फ एक मंत्री या विधायक का जाना नहीं है। यह उस राजनीतिक यात्रा का अचानक रुक जाना है, जो तीन दशक तक संघर्ष, संगठन और सक्रिय राजनीति से होकर आगे बढ़ी थी।
सुदिव्य कुमार सोनू के जाने से झामुमो ने एक संगठनकर्ता खोया, सरकार ने एक सक्रिय मंत्री खोया और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपना एक भरोसेमंद साथी। वहीं गिरिडीह ने ऐसा जनप्रतिनिधि खोया, जिसने हार के बाद भी मैदान नहीं छोड़ा और अंततः अपनी मेहनत से राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
उनका राजनीतिक सफर भले ही अचानक थम गया, लेकिन एक कार्यकर्ता से मंत्री तक पहुंचने की उनकी कहानी झारखंड की राजनीति में लंबे समय तक याद की जाएगी।


