मानव को प्रकृति से जोड़ने वाला पर्व है करम : कुलपति प्रो. (डॉ) राजीव मनोहर
– हेमन्त अहीर
रांची। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू), रांची में करम पर्व पूरे उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। विश्वविद्यालय परिसर स्थित अखड़ा में आयोजित समारोह में विभिन्न जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभागों के छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक नृत्य-गीत प्रस्तुत कर माहौल को उत्सवमय बना दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) राजीव मनोहर ने कहा कि करम पर्व मनुष्य को प्रकृति के साथ जुड़े रहने का संदेश देता है। यह पर्व समाज में सामूहिकता और एक-दूसरे के साथ मिलकर रहने की भावना को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि विज्ञान के आधुनिक विकास से बहुत पहले से ही झारखंड की संस्कृति में प्रकृति के संरक्षण और सम्मान की परंपरा रही है।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. धनंजय वासुदेव द्विवेदी ने करम पर्व के प्राकृतिक, पर्यावरणीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसे पर्व समाज को एक सूत्र में जोड़ने और हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम करते हैं।
विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) यू.सी. मेहता ने कहा कि करम पर्व पूर्वी भारत के कई राज्यों में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय की स्थापना के समय से ही यहां करम और सरहुल जैसे पारंपरिक पर्वों का आयोजन होता रहा है।
पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) सत्यनारायण सिंह मुंडा ने कहा कि विश्वविद्यालय की नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं— मुंडारी, संताली, हो, खड़िया, कुड़ुख, कुड़मालि, पंचपरगनिया, खोरठा और नागपुरी —में अनेक मौखिक परंपराएं और लोक ज्ञान मौजूद हैं। इन परंपराओं को शोध और शिक्षा के माध्यम से संरक्षित किया जा सकता है। उन्होंने करम पर्व को नव सृजन और नई ऊर्जा का प्रतीक बताया।
हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जिंदर सिंह मुंडा ने कहा कि करम पर्व विभिन्न समुदायों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक समागम का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यहां की संस्कृति में मनुष्य के कर्म और सामाजिक जिम्मेदारी का विशेष महत्व है।
जनजातीय शोध संस्थान के पूर्व निदेशक सोमा सिंह मुंडा ने कहा कि झारखंड के लोग भले ही आर्थिक और भौतिक रूप से पीछे रहे हों, लेकिन सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से उनकी परंपराएं काफी समृद्ध हैं। करम पर्व इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
पद्मश्री मुकुंद नायक ने कहा कि करम पर्व प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति आधारित ऐसे पर्वों को देश और दुनिया तक पहुंचाने में झारखंड के नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा-भाषी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
पारंपरिक विधि से हुई करम पूजा:

कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों द्वारा तैयार किए गए जाउआ को पारंपरिक नृत्य-गीत के साथ अखड़ा में लाकर स्थापित करने से हुई। इसके बाद पाहान के साथ छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक नृत्य-गीत प्रस्तुत किया और विधिवत करम डाली लाई गई।
करम डाली की पूजा डॉ. जुरन सिंह मानकी एवं प्रो. महेश भगत द्वारा संपन्न कराई गई। इस दौरान बड़ी संख्या में उपवास रखने वाली छात्राओं ने करम डाली के चारों ओर बैठकर पूजा-अर्चना की।
करम पूजा के अवसर पर टीआरआई के पूर्व उप निदेशक सोमा सिंह मुंडा ने करमा-धरमा की पारंपरिक कथा और करम पर्व की उत्पत्ति से जुड़ी लोककथा सुनाई। विश्वविद्यालय के सभी नौ भाषा विभागों की सहभागिता को दर्शाने के लिए कलश में जलता हुआ दीपक लाकर अखड़ा में स्थापित किया गया।
नौ भाषाओं के छात्र-छात्राओं ने प्रस्तुत किए पारंपरिक नृत्य-गीत :
समारोह में मुंडारी विभाग के छात्र-छात्राओं ने अतिथियों का पारंपरिक तरीके से परछन किया। इसके बाद शिक्षकों ने अतिथियों को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया। कुड़मालि विभाग के छात्र-छात्राओं ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया।
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के कोऑर्डिनेटर डॉ. विनोद कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के अब तक के कुलपतियों के योगदान का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए वर्तमान कुलपति के समक्ष जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभागों में शिक्षकों और संसाधनों की कमी सहित विभिन्न समस्याएं रखीं।
कार्यक्रम के दौरान कुड़मालि, कुड़ुख, नागपुरी, मुंडारी, पंचपरगनिया, संताली, खड़िया, खोरठा और हो सहित सभी नौ भाषा विभागों के छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक नृत्य और गीत प्रस्तुत किए। प्रस्तुतियों ने समारोह में मौजूद लोगों को झूमने और उत्साहित होने पर मजबूर कर दिया।
अंत में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करम डाली और जाउआ का विसर्जन किया गया।
करम पर्व प्रकृति, भाई-बहन के प्रेम और सामूहिकता का प्रतीक :
करम पर्व आदिवासी-मूलनिवासी समाज का महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है। भाद्र महीने की एकादशी को करम डाली की पूजा के बाद अगले दिन इसके विसर्जन के साथ पर्व का समापन होता है।
करम पर्व को भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक एकजुटता से भी जोड़ा जाता है। पर्व से कुछ दिन पहले कुंवारी लड़कियां जलाशय से जाउआ उठाती हैं। जाउआ उठाने वाली लड़कियों को ‘जाउआ माइ’ कहा जाता है। वे जाउआ की देखभाल मां की तरह करती हैं।
करम वृक्ष की डाली की पूजा प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है। वहीं करम पर्व के सामूहिक नृत्य-गीत समाज में समरसता, एकता और मिल-जुलकर जीवन जीने की भावना को मजबूत करते हैं।
कई शिक्षक, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं रहे मौजूद :
समारोह में डोरंडा कॉलेज के नागपुरी प्राध्यापक डॉ. यूगेश कुमार महतो, छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष डॉ. सर्वोत्तम कुमार, वित्त पदाधिकारी डॉ. अनिता मेहता, बीएड. की डॉ. अरविंद कुमार मौर्य, संस्कृत की डॉ. मनीषा बोदरा, भौतिकी के डॉ. अश्वनी कुमार शर्मा, कुड़मालि के डॉ. निताई चंद्र महतो, कुड़ुख की डॉ. सीता कुमारी, खड़िया की शांति केरकेट्टा, संताली के संतोष मुर्मू, हो के दिलदार पूर्ति, मुंडारी की डॉ. शांति नाग एवं डॉ. दशमी ओड़ेया, खोरठा की सुशीला कुमारी सहित विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं एवं विश्वविद्यालय के कर्मचारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन संताली एवं हो विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. डुमनी माई मुर्मू एवं डॉ. जय किशोर मंगल ने संयुक्त रूप से किया। धन्यवाद ज्ञापन कुड़ुख विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. सुनीता कुमारी ने किया।


