रांची : झारखंड की खनिज संपदा से जुड़ा विवाद अब संसद से निकलकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की ओर बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मंजूरी के बाद झारखंड सरकार ने केंद्र के संशोधित खान एवं खनिज कानून (Mines and Minerals Development and Regulation 2026) को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। राज्य के वित्त और खनन विभाग ने प्रस्तावित याचिका का कानूनी खाका भी तैयार कर लिया है।
राज्य सरकार का कहना है कि नए कानून से झारखंड के आर्थिक हितों के साथ-साथ राज्यों के संवैधानिक अधिकार भी प्रभावित होंगे। सरकार के अनुमान के मुताबिक, कानून लागू होने के बाद झारखंड को हर साल करीब 14 से 15 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है। सरकार का दावा है कि इससे कई जनकल्याणकारी योजनाओं पर असर पड़ सकता है, जिनमें महिलाओं को आर्थिक सहायता देने वाली ‘मइयां सम्मान योजना’ भी शामिल है।
नए कानून का उद्देश्य खनिज अधिकारों और खनिज संपदा वाली जमीन पर टैक्स या सेस लगाने के राज्यों के अधिकारों को सीमित करना बताया जा रहा है। झारखंड सरकार इसे राज्यों के अधिकारों और संघीय ढांचे से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा मान रही है।
राज्य सरकार का आरोप है कि केंद्र खनिज संपदा वाले क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण और भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसी आधार पर सरकार नए प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
झारखंड सरकार ने केंद्र पर खनन से जुड़े करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये के बकाये का दावा भी किया है। राज्य सरकार को आशंका है कि नए कानून के लागू होने के बाद इस राशि की वसूली का रास्ता और मुश्किल हो सकता है।
खनिज कानून के मुद्दे पर झारखंड में राजनीतिक टकराव भी तेज हो गया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस संशोधन का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस ने राज्य के सभी जिलों में कलेक्टर कार्यालयों के बाहर धरना दिया और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा।
वहीं, राज्य सरकार विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी भी कर रही है। सरकार इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा और आगे की रणनीति तय करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
दूसरी ओर, भाजपा केंद्र के संशोधित कानून के समर्थन में है। पार्टी का कहना है कि नए कानून से खनिज संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगाने में मदद मिलेगी।
भाजपा ने कानून के फायदे लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘जन जागरण अभियान’ चलाने की बात कही है। ऐसे में खनिज कानून अब झारखंड की राजनीति के साथ-साथ केंद्र-राज्य संबंधों का भी बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।


